चारो तरफ सन्नाटा है । रचना सोच रही थी वोहमेशा कहती थी दिनभर गाडियो के शोर उडती धूल से कब छुटकारा मिलेगा।नोकरीओर घर की व्यस्तता से कभी-कभी ऊब सी होती थी ।सोचती थी कुछ दिनोका आराम ले लिया जाए पर हो नहीं पा रहा था।पति देव से एक-दो दिन का देश व्यापक हड़ताल का जिक्र किया तो उन्होंने झल्लाकर कहा देश से बडा कोई भी नहीं है।उसका यह मजाक भरी सोच इतनी बडी होगी सोचा भी नहीं था। बंद दरवाजे, से आज उसे ऊबने सी लग रही थी।चाय पीते हुए उसने दरवाजे से झाँका तभी बेटा चिल्लाने लगा माँ 60की हो आप अंदर रहो । माँ झल्लाकर बोलीदिन भर का काम तो बढ गया है मेरा, तू तो कम्प्यूटर पर ही बैठा रहता है।फिर इतना तनाव किस चीज मे वाइरस आजाये कभी सब्जी दो बार धोती हू ,कभी- हाथ कभी हैंगर धोती हूँ ,कितनाभयावह समय है ।सुबह टीवी इस आशय से खोलती हू कोई खबर लाकडाउन खत्म की आ जाये थकान,अनिद्रा, एक अजीब सी अकुलाहटहै।स्कूल के बच्चो की मुस्कान याद आती हैं क्या करूँ। बेटा बोला माँ यह युद्ध है सभी को मिलकर लडना है। क्या करू माँ लाकडाउन के कारण मेरा काम ज्यादा हो गया है कंपनी को काम करकर देना पडता है।टाईम का बंधन भी नहीं रहा माँ। अब तेरे काम भी करवा दूँगा ऐसा करो माँ वो करो जो आपने कई वषो से पीछे छोड दिया है ।रचना ने कलम निकाली ओर कागज पर अपनी दिनचर्या मे कुछ घंटे अपने लिए लिख कर चिपका दिए ।पति पूछ बैठें यह क्या है?मेरा अपना समय ।आज उसे न थकान थी न भय आज उसकी कलम कहानी लिख रही थी। वर्षो से बंद पडी कला आज फिर जाग्रत हो गई ।
डा सुचिता श्रीवास्तव